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प्रतिनिधित्‍व के मायने (राष्‍ट्रपति चुनाव 2022)

गंगा सहाय मीणा

द्रौपदी मुर्मू का नाम राष्‍ट्रपति पद के लिए उम्‍मीदवार के रूप में घोषित होने के बाद समाज के विभिन्‍न तबकों की ओर से आई प्रतिक्रियाऍं भारतीय जनमानस की सामाजिक संवेदनशीलता के स्‍तर का पता लगाने के लिए पर्याप्‍त हैं। किसी भी लोकतांत्रिक समाज के स्‍वास्‍थ्‍य की जॉंच का एक तरीका यह हो सकता है कि उसमें अंतिम व्‍यक्ति की क्‍या स्थिति है! इस मायने में आजादी के 75 वर्ष बाद भी भारतीय लोकतंत्र समावेशी और पूर्ण नहीं कहा जा सकता क्‍योंकि अभी तक देश के सर्वोच्‍च पदों पर वंचित तबकों में भी हाशिए पर स्थित आदिवासियों को प्रतिनिधित्‍व नहीं मिला है। राष्‍ट्रपति, प्रधानमंत्री, उच्‍चतम न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीश आदि भारतीय लोकतंत्र के सर्वोच्‍च पद माने जाते हैं। इनमें से किसी पद पर अभी तक किसी आदिवासी को नहीं चुना गया है। इस अर्थ में द्रौपदी मुर्मू को एनडीए की ओर से राष्‍ट्रपति पद का उम्‍मीदवार बनाये जाना ऐतिहासिक है। उनको उम्‍मीदवार बनाकर एनडीए और भारतीय लोकतंत्र ने भूल-सुधार का कार्य किया है।

द्रौपदी मुर्मू का नाम घोषित होने के बाद से उन्‍हें ‘रबर स्‍टैम्‍प’ या प्रभावहीन कहा जा रहा है। उनकी योग्‍यता और काम करने की क्षमता पर सवाल उठाये जा रहे हैं। क्‍या वे आदिवासियों का हित कर पाऍंगी? इस सवाल को आधार बनाकर प्रकारांतर से आदिवासी जनप्रतिनिधित्‍व को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। तमाम नामों में से द्रौपदी मुर्मू को एनडीए द्वारा राष्‍ट्रपति पद का उम्‍मीदवार बनाए जाना और एक राष्‍ट्रपति के रूप में उनकी क्षमताओं पर बात करना, दो अलग-अलग सवाल हैं। दोनों को एक-एककर समझना चाहिए।

प्रतीकात्‍मक पहलों द्वारा वंचितों के तुष्टिकरण की राजनीति कांग्रेस करती रही है, इसलिए अपेक्षा यह थी कि जिस तरह कांग्रेस ने दलितों और अल्‍पसंख्‍यकों के हित में तुष्टिकरण की राजनीति की, उसी तरह देश के सर्वोच्‍च संवैधानिक पदों तक आदिवासियों को पहुंचाने में भी कांग्रेस ही पहल करेगी, लेकिन पिछले वर्षों में यह देखने में आया है कि भाजपा के नेतृत्‍व वाली एनडीए सरकार ने तुष्टिकरण के मामले में कांग्रेस को भी पीछे छोड़ दिया है। मुस्लिम-विरोधी मानी जाने वाली एनडीए सरकार ने एपीजे अब्‍दुल कलाम को राष्‍ट्रपति बनाकर धर्म-निरपेक्षता का दावा प्रस्‍तुत किया और ट्रिपल तलाक के प्रश्‍न को केन्‍द्रीय प्रश्‍न बनाकर मुस्लिम महिलाओं के बीच जगह बनाने की कोशिश की। उसी एनडीए ने रामनाथ कोविंद को राष्‍ट्रपति बनाकर दलित-विरोधी छवि में सुधार का प्रयास किया। एक तरफ राष्‍ट्रपति के रूप में सर्वोच्‍च संवैधानिक पद पर एक दलित को सम्‍मान दिया और दूसरी तरफ उसी दौरान एससी-एसटी एक्‍ट को कमजोर करने और रोस्‍टर में बदलाव के माध्‍यम से विश्‍वविद्यालयी व्‍यवस्‍था से दलित-आदिवासियों की बेदखली के प्रयास हुए। सन 2019 के आम चुनावों के परिणाम बताते हैं कि तुष्टिकरण की यह नीति भाजपा और एनडीए के पक्ष में रही।

इसी नीति के तहत अब द्रौपदी मुर्मू को राष्‍ट्रपति पद का उम्‍मीदवार बनाया गया है। गुजरात, मध्‍यप्रदेश, छत्‍तीसगढ़ सहित जिन राज्‍यों में जल्‍द विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, वहॉं एनडीए सरकार की नीतियों के कारण आदिवासी बहुल क्षेत्रों में तीव्र प्रतिरोध है। पूंजीवादी विकास का पूरा खेल आदिवासियों के जल-जंगल और जमीन पर खेला जा रहा है और आदिवासी इसके खिलाफ सतत रूप से संघर्षरत हैं। दूसरी तरफ एनडीए के पास राष्‍ट्रपति चुनने के लिए मत संख्‍या भी अपर्याप्‍त थी। ऐसा माना जा रहा है कि आदिवासी महिला को राष्‍ट्रपति पद का उम्‍मीदवार बनाकर एनडीए ने दोनों मोर्चों पर फतह हासिल कर ली है। बीजू जनता दल सहित कई एनडीए के बाहर के दलों का द्रौपदी मुर्मू की उम्‍मीदवारी को समर्थन मिलना इसका प्रमाण है। 

राष्‍ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मू आदिवासियों का कितना हित कर सकेंगी, विश्‍लेषकों द्वारा इस प्रश्‍न को बार-बार उठाया जा रहा है। जाहिर है सर्वोच्‍च संवैधानिक पद होने के बावजूद भारतीय शासन व्‍यवस्‍था में राष्‍ट्रपति की भूमिका सीमित है। देश के सबसे बड़े फैसले संसद में लिये जाते हैं और व्‍यावहारिक रूप में सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री और केन्‍द्रीय मंत्रीमंडल होता है। इसके बावजूद राष्‍ट्रपति सक्रिय और सकारात्‍मक हस्‍तक्षेप द्वारा अपनी भूमिका निभा सकते हैं। भारत के संविधान द्वारा देश के आदिवासियों को दिये गए अधिकारों के संरक्षक राष्‍ट्रपति ही होते हैं। संविधान की 5वीं और 6ठी अनुसूची में देश के आदिवासियों को प्रदत्‍त अधिकारों को राष्‍ट्रपति और उनके निर्देशन में राज्‍यपाल ही लागू करा सकते हैं। पेसा (पंचायत्स एक्‍टेंशन टू शिड्यूल्‍ड एरियाज) अधिनियम 1996 आदिवासी हित में प्रभावी भूमिका निभा सकता है। राष्‍ट्रपति अपने दखल से पेसा को लागू करवा सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि टीएसी (ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल्‍स) केवल कागजी संस्‍था की जगह एक प्रभावकारी संस्‍था के रूप में काम करे। 

राष्‍ट्रपति पद का प्रतीकात्‍मक महत्त्‍व है। किसी वंचित समुदाय के व्‍यक्ति के ऊँचे पद पर पहुंचने से उस तबके में आत्‍मविश्‍वास आता है। वे उससे मिलने के बारे में सोच सकते हैं। एक बड़ी आबादी को यह महसूस होता है कि हॉं, इस व्‍यवस्‍था में हमारी भी भागीदारी है। देश की आदिवासी आबादी अभी तक सत्‍ता-व्‍यवस्‍था से अलगाव ही महसूस करती रही है। फिर द्रौपदी मुर्मू आदिवासी समुदाय के साथ आधी आबादी, यानी स्त्रियों की भी प्रतिनिधि हैं। अभी तक देश को केवल एक महिला प्रधानमंत्री और एक महिला राष्‍ट्रपति ही मिल पाई हैं। स्‍त्री का शीर्ष पद पर होना आधी आबादी में आत्‍मविश्‍वास बढाएगा। राष्‍ट्रपति बहुत सारी संस्‍थाओं के प्रमुख होते हैं। वे अपने सकारात्‍मक हस्‍तक्षेप से इन संस्‍थाओं में वंचितों का प्रतिनिधित्‍व सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं। राष्‍ट्रपति अंतत: एक राजनेता, एक पार्टी का प्रतिनिधि ही होता है, कोई जनांदोलनकारी नहीं; इसलिए उससे अपे‍क्षाऍं उसी प्रकार की की जानी चाहिए। गैर-आदिवासी राष्‍ट्रपति भी देश में कोई आमूल परिवर्तन नहीं ला सकते। इसलिए प्रतीकात्‍मक ही सही, देश की पहली आदिवासी राष्‍ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मू का स्‍वागत ही किया जाना चाहिए। 

(आदिवासी चिंतक, एसोसिएट प्रोफेसर, भारतीय भाषा केन्‍द्र, जेएनयू, नई दिल्‍ली)

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